पटरियों पर पड़ा हुआ Pendrive – Chapter – I

मुम्बई की बारिश हमेशा कुछ न कुछ छीपाती है—कभी सड़क का गड्ढा, कभी किसी आदमी का दर्द, और कभी किसी अनजान रात का राज़। पर उस रात, जो कुछ भी छिपा हुआ था, वो सीधे मेरे पैरों के नीचे था… Kalyan स्टेशन की पटरियों के बिलकुल पास। रात के करीब 11 बज रहे थे, लोकल ट्रेन का आखिरी रश थोड़ा कम हो चुका था, बारिश लगातार चादर की तरह गिर रही थी, और मैं—Ayan—एकदम थका हुआ, ऑफिस की फाइलों से परेशान, बस घर पहुँचकर सो जाने की सोच रहा था। लेकिन जैसे ही मैं प्लेटफॉर्म 3 की तरफ बढ़ा, मेरे कानों में एक अजीब सी metallic आवाज़ पड़ी—ऐसी जैसे कोई छोटा object लोहे की पटरी से टकराकर गिरा हो। पहले लगा शायद किसी का चाबी का गुच्छा होगा, पर फिर मेरी नज़र कुछ चमकती चीज़ पर अटक गई। बारिश की बूंदें उस छोटे काले प्लास्टिक बॉक्स पर गिरकर एक अजीब सा reflection बना रही थीं। मैं थोड़ा झुककर देखता हूँ—वो एक pendrive थी। टूटा हुआ दिमाग़, थोड़ा सा किनारा झड़ चुका था, पर USB कनेक्टर बिल्कुल साफ़। किसी ने इसे जानबूझकर गिराया नहीं हो सकता… ये जैसे किसी ने फेंका हो… या शायद किसी के हाथ से छूट गया हो। पर जो बात और भी अजीब थी—वो pendrive पटरियों से कुछ इंच ही दूर थी और उसके बिल्कुल पास प्लेटफॉर्म की दीवार पर खून जैसा कुछ फैला था। हल्का-सा, बारिश में घुला हुआ, पर unmistakable। मेरे कदम वहीं अटक गए। दिल दो पल के लिए जैसे किसी invisible हाथ ने दबा दिया हो। मैं कभी ज़्यादा दिमाग़ नहीं लगाता इन चीज़ों में, पर उस रात पता नहीं क्यों, मैं उस pendrive को उठाने से खुद को रोक नहीं पाया। जैसे कोई magnetic pull हो। मैं झुककर उसे उठाता हूँ—ठंडा, पानी से भीगा, और अजीब तरीके से भारी। कुछ सेकंड मैं सोचता रहा कि इसे वहीं छोड़ देना चाहिए, लेकिन curiosity इंसान से क्या-क्या करवा दे… पता ही नहीं चलता। उसी curiosity ने मुझे बर्बादी के पहले कदम तक पहुँचा दिया था। मैं जल्दी-से लोकल में चढ़ा, सीट पर बैठते ही pendrive को जेब में रखा, और किसी तरह दिमाग़ को समझाया—“Ayan, तू पागल है क्या? किसी random pendrive को घर ले जा रहा है? आजकल लोग explosive devices भी ऐसे ही disguise करते हैं।” पर भीतर एक आवाज़ बार-बार कह रही थी—ये pendrive तेरे लिए छोड़ी गई है। मैंने सिर झटका, खुद को काम की टेंशन में व्यस्त दिखाने की कोशिश की, पर अजीब बात ये थी कि ट्रेन में बैठे हर शख्स को मैं suspicious नज़रों से देखने लगा। जैसे कोई मुझे observe कर रहा हो। ट्रेन CST की तरफ धीमे-धीमे बढ़ रही थी, और हर स्टेशन पर लग रहा था कि कोई मेरे पीछे खड़ा है, कोई मुझे घूर रहा है, कोई मेरी जेब में रखे उस pendrive के बारे में सब जानता है। Kalyan से Mulund तक तो मैं सिर्फ बारिश को देखता रहा, पर जब ट्रेन Kurla पहुँची, तभी एक आदमी मेरे कोने वाले सीट के सामने आकर खड़ा हो गया—काला raincoat, चेहरा आधा छुपा हुआ, और उसकी आँखें… मैं क्या ही बताऊँ। जैसे किसी का एक्स-रे कर रही हों। उसकी नज़रें हर बार मेरी जेब पर टिकती थीं। अचानक उसने अपनी hoodie ठीक करते हुए मेरे पास झुककर बहुत धीमी आवाज़ में कहा—“जो चीज़ तूने उठाई है… वो तुझे नहीं उठानी चाहिए थी।” मुझे लगा शायद hallucination हो, मैंने तुरंत headphones लगा लिए। पर मैं किसी गाने की आवाज़ नहीं सुन पा रहा था… क्योंकि दिल की धड़कनें, सीने का दबाव, और माथे पर भारीपन—सब कुछ इतना तेज़ था कि आसपास की आवाज़ें गायब हो चुकी थीं। जब मैं CST पहुँचा, तब तक वो आदमी कहीं नहीं दिखा। शायद उतर चुका था। शायद मैं ज़्यादा सोच रहा था। शायद वो मेरी imagination थी। शायद… पर रात अभी खत्म नहीं हुई थी। घर पहुँचकर मैं लगभग दरवाज़ा पटकते हुए अंदर घुसा, शर्ट फेंकी, लैपटॉप ऑन किया और खुद से बोला—“बस 2 मिनट देखता हूँ इस pendrive में क्या है, फिर सो जाऊँगा।” मैंने pendrive लगाया। स्क्रीन पर पहले 5 सेकंड कुछ नहीं हुआ। फिर अचानक एक folder खुला—unnamed, कोई title नहीं। उसके अंदर सिर्फ एक ही file—“1147.mp4”। नाम देखकर ही मेरे पेट में जैसे किसी ने घूंसा मार दिया। 11:47… वही समय… लगभग वही वक्त… जब मैं Kalyan स्टेशन पर पहुँचा था। मैंने file खोली। स्क्रीन काली। बारिश की आवाज़। हवा की सीटी। और फिर… एक आदमी का silhouette दिखाई दिया। कैमरा किसी कुण्डली की तरह उसके चारों तरफ घूम रहा था। लोकेशन अंधेरी थी, पर इतने dim light में भी पता चल रहा था कि वो किसी को पकड़कर खींच रहा है। किसी इंसान को। फुटेज shaky थी, लेकिन हर खरोंच, हर struggle की आवाज़, हर चीख की गूँज, मेरे कमरे की दीवारों से टकरा रही थी। मुझे डर लगने लगा। मैं पीछे हटना चाहता था। मैं file बंद करना चाहता था। लेकिन मेरे हाथ जैसे freeze हो गए थे। स्क्रीन पर वो आदमी अब बिलकुल नज़दीक आ चुका था। उसने जमीन पर पड़े किसी आदमी के गर्दन पर पैर रखा… और फिर कैमरे की तरफ मुड़कर देखने लगा। उसी समय बिजली की एक हल्की चमक फुटेज में आई—और मैं खुद को खून में जमता हुआ महसूस करने लगा। क्योंकि वो आदमी… वो killer… वो mask पहना हुआ चेहरा… वो नज़रें… वो posture… वो सब मुझे ही देख रहा था। जैसे उसे पता था कि मैं ये वीडियो एक दिन खोलूँगा। जैसे ये message सीधा मेरे लिए था। और फिर आखिरी 2 सेकंड—
स्क्रीन पर लाल अक्षरों में उभरता है:
“Victim: AYAN
Time Left: 4 Hours.”

मेरे हाथ एकदम सुन्न हो चुके थे। TV बंद हो गया। कमरे की लाइट अचानक flicker करने लगी। बाहर बारिश की आवाज़ तेज़ हो गई। पास की गलियों में कुत्तों के भौंकने की आवाज़ गूँजने लगी। और पहली बार मुझे ऐसा लगा कि मेरे कमरे में कोई खड़ा है। कोई मेरे पीछे। कोई मेरी हर साँस देख रहा है। मैं पलट भी नहीं पा रहा था। दिल धक-धक कर नहीं धड़धड़ा रहा था—वो literally दिमाग़ को काट रहा था। मैं कुछ समझ पाता उससे पहले—मेरे फोन पर एक message आया। Unknown number. Message में लिखा था:
“Clock started. 4 Hours. Don’t run.”
मैंने फोन नीचे गिरा दिया।
मैंने खिड़की बंद कर दी।
मैं खुद को समझा रहा था कि ये prank है—ये कोई मज़ाक है—ये कोई edited video है—पर दिमाग़ नहीं मान रहा था।
क्योंकि तभी मेरे दरवाज़े पर…
एक हल्की-सी दस्तक हुई।
इतनी धीमी… जैसे कोई अंदर आने की इजाज़त मांग रहा हो।
जैसे उसे पता हो कि मैं उसे सुन लूँगा।
और फिर दूसरी दस्तक—
थोड़ी ज़ोर से।
मैं freeze।
और तीसरी दस्तक—
इस बार खिड़की के काँच तक हिल गए।
और तभी दरवाज़े के नीचे से एक shadow अंदर सरकी—
लंबी, खिंची हुई, जैसे कोई दरवाज़े के बिलकुल बाहर खड़ा हो।
शरीर पर सन्नाटा।
दिमाग़ में सिर्फ एक पंक्ति गूंज रही थी—
Victim: Ayan.

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