रात के ठीक 2:11 बजे अचानक मेरी नींद किसी अजीब सी आवाज़ से टूट गई—ऐसी आवाज़ जैसे किसी ने दरवाज़े के नीचे से कुछ सरकाया हो। कमरा अंधेरा था, हवा बिल्कुल थमी हुई, और बाहर स्ट्रीट लाइट की हल्की-सी पीली रोशनी खिड़की के पर्दे से छनकर फर्श पर एक टेढ़ी लाइन जैसी पड़ रही थी।
मैंने उठकर मोबाइल देखा—कोई नेटवर्क नहीं।
ये बात मेरे दिल में एक अजीब सी घबराहट की तरह चुभ गई।
मैंने तकिये के पास रखा अपना चश्मा पहना और धीरे-धीरे दरवाज़े की तरफ बढ़ी।
मेरे पाँव ठंडे फर्श पर पड़ते ही झनझना उठे। बाहर कहीं दूर कोई कुत्ता लगातार भौंक रहा था, जैसे किसी अनदेखी चीज़ को देख रहा हो।
मैंने दरवाज़ा खोलने की हिम्मत नहीं की।
बस नीचे झुककर देखा…
एक सफ़ेद लिफाफ़ा।
मेरा गला सूख गया।
ठीक ऐसा ही दो साल पहले भी होता था—जब Aarav रात के किसी भी वक्त मेरे दरवाज़े पर फूल, चॉकलेट या कोई छोटा सा नोट रख देता था।
लेकिन तभी दिमाग ने झटका दिया—
Aarav मर चुका है।
दो साल पहले।
एक भयानक एक्सीडेंट में।
मैंने खुद उसका चेहरा देखा था… आखिरी बार।
खून, काँच के टुकड़े, टूटी हुई घड़ी…
उस दिन की हर आवाज़ आज भी कानों में बजती है।
तो ये लिफ़ाफ़ा यहाँ कैसे?
मैंने धीरे से उसे उठाया।
मेरे हाथ कांप रहे थे।
लिफ़ाफ़े से एक हल्की-सी खुशबू आ रही थी…
वही खुशबू।
Aarav का “Timber Wood” perfume।
वही परफ्यूम जो उसकी शर्ट से हमेशा आता था, वही महक जो मेरी उंगलियों में रह जाती थी जब मैं उसकी कलाई थामती थी।
मेरी रीढ़ में एक बर्फ़ीला डर दौड़ गया।
लेकिन डर के नीचे कुछ और था…
एक अजीब सी उम्मीद।
एक ऐसी उम्मीद जो नहीं होनी चाहिए थी।
मैं वापस कमरे में आई, टेबल लैंप जलाया, और लिफ़ाफ़े को अपने सामने रखा।
लिफ़ाफ़े पर मेरा नाम छोटे-छोटे, गोल अक्षरों में लिखा था—
“Anushka.”
ठीक Aarav की लिखावट जैसी।
नहीं…
“जैसी” नहीं।
उसी की। बिल्कुल उसी की।
मैंने कई मिनट तक लिफ़ाफ़ा खोला भी नहीं।
बस उसे घूरती रही, जैसे कि वो फट पड़ेगा या खुद खुल जाएगा।
दिल की धड़कन इतनी तेज़ थी कि पूरा कमरा मानो उसकी आवाज़ से गूंज रहा हो।
आखिरकार, मैंने धीरे से सील तोड़ी।
अंदर से एक फोल्ड किया हुआ कागज़ निकला—पुराने जमाने के पीलेपन वाला नहीं, बिल्कुल नया लेकिन अजीब तरह से नरम। जैसे किसी ने उसे कई बार हाथों में मसल कर सीधा किया हो।
कागज़ खोलते ही अंदर की स्याही की गंध महसूस हुई—
और उसी परफ्यूम की महक और तेज़ हो गई।
मैंने पढ़ना शुरू किया।
“Anu,
मुझे पता है तुम मुझे भूलने की बहुत कोशिश कर रही हो…
लेकिन मैं वापस आ गया हूँ।”
मेरी सांस रुक गई।
एक सेकंड में पूरा शरीर पसीने से भर गया।
लिखावट…
हर ‘A’ का स्ट्रोक…
हर ‘u’ की मोड़…
हूर्форм का हर टुकड़ा…
सब Aarav जैसा।
Exactly Aarav.
मैंने खत को बार-बार देखा, रोशनी में घुमाया, उंगलियों से लिखा हुआ स्पर्श किया…
ये असंभव था।
कोई उसके जैसा लिख नहीं सकता।
इतनी सटीक…?
Aarav की लिखावट इतनी अनोखी थी कि कॉलेज में नोट्स लिखने के लिए सब उसे कहते थे।
उसके ‘R’ का नीचे वाला curve…
उसका ‘k’ लिखने का तरीका…
सबकुछ वही था।
मैंने फिर खत पढ़ा—
“तुम्हें लगता है मैं चला गया?
नहीं Anu…
प्यार कभी नहीं मरता।
और मैं भी नहीं।”
मेरे हाथ इतने कांपने लगे कि पेपर हिलने लगा।
मैं उठकर कमरे के कोने में चली गई, दीवार से टिककर खड़ी हो गई।
मेरी साँसें बार-बार टूट रही थीं।
आँखें गर्म थीं, आवाज़ गले में अटक गई थी।
“ये कौन है?
कौन इतनी बड़ी गंदा मजाक कर सकता है?”
मैंने खुद से कहा।
लेकिन ये सिर्फ मजाक नहीं था।
किसी को इतने गहरे डिटेल कैसे पता हो सकते हैं?
Aarav की handwriting…
उसकी महक…
उसकी phrasing…
उसके खास शब्द…
“Anu” — ये नाम सिर्फ वो ही लेता था।
मेरे कमरे की खिड़की बाहर सड़क की तरफ थी।
मैंने पर्दा थोड़ा हटाकर बाहर देखा।
सड़क खाली।
हवा धीमी।
दूर एक ऑटो खड़ा।
स्ट्रीट लाइट टिमटिमा रही थी।
लेकिन तभी…
मानो कोई छाया दूर पेड़ के पास से हिली हो।
मैं एकदम पीछे हट गई।
दिल तेजी से धड़कने लगा।
क्या कोई मुझे देख रहा है?
मैंने बिना आवाज़ किए पर्दा वापस गिरा दिया।
मेरा दिमाग तेज़ी से पीछे भागा—
दो साल पहले का वो दिन।
Aarav का जाना।
उसका आखिरी संदेश।
“अनु, मैं शाम 7 बजे मिलने आऊँगा… एक ज़रूरी बात है।”
पर वो कभी नहीं आया।
उसका फोन नहीं उठा।
फिर न्यूज़…
फिर वो टूटी हुई बाइक…
फिर अस्पताल का कॉरिडोर…
फिर वो चादर के नीचे उसका चेहरा…
मैंने खुद उसकी उंगली पहचानी थी—
वही अंगूठे का हल्का सा कट जो बचपन में हुआ था।
तो फिर ये खत?
मेरे दिमाग ने बार-बार खुद को समझाने की कोशिश की कि ये किसी का मजाक है।
लेकिन मेरा दिल…
उसे समझ नहीं आ रहा था कि डरना चाहिए या रोना चाहिए।
मैंने दुबारा खत खोला।
नीचे एक लाइन और थी—
जो शायद मैंने पहले नोटिस नहीं की:
“तुम्हारा घर अब भी वही है।
मैं रोज़ पास से गुजरता हूँ।”
मेरी सांस ठंडी पड़ गई।
मतलब…
किसी को मेरा एड्रेस पता है।
किसी को मेरे घर आने-जाने का टाइम पता है।
किसी को मेरे डर की गहराई पता है।
मैंने खत हाथ से झटककर टेबल पर फेंका।
अचानक कमरे में जैसे सब कुछ धीमा हो गया हो—
घड़ी की टिक-टिक, बाहर की हवा, मेरा दिल… सब कुछ।
मैंने खुद को शांत करने की कोशिश की।
“कुछ नहीं है… बस कोई बदतमीज़… बस कोई stalker…”
लेकिन तभी…
टेबल पर रखा फोटो फ्रेम गिरकर फर्श पर टूट गया।
बिना किसी हवा के।
बिना किसी धक्के के।
धीमी आवाज़ में, काँच ज़मीन पर बिखर गया।
मैं डर के मारे एक कदम पीछे हट गई।
वो फोटो फ्रेम वही था जिसमें मेरी और Aarav की आखिरी तस्वीर थी—
जो मैंने उसकी मौत के बाद भी हटाई नहीं थी।
फोटो का एक टुकड़ा पलटकर नीचे गिरा।
मैं हिम्मत करके पास गई और उसे उठाया।
पीछे Aarav ने अपनी लिखावट में एक छोटा सा नोट लिखा था:
“Always beside you.”
मैंने वो नोट कई बार देखा था…
लेकिन आज…
उस पर कुछ नया लिखा हुआ था—
काली स्याही में एक ताज़ा लाइन:
“मैंने कहा था ना… वापस आऊँगा।”
मेरे हाथों से फोटो लगभग गिर ही गया।
कहाँ से आया ये नया वाक्य?
फोटो फ्रेम में तो हमेशा ग्लास लगा रहता है।
आज तक किसी ने उसे छुआ तक नहीं।
मैं दीवार से लगकर बैठ गई।
घुटने सीने में खींच लिए।
आँखों से आँसू निकल रहे थे।
तभी…
दरवाज़े पर फिर वही आवाज़।
“सर्र्र्र——”
जैसे कोई दूसरा लिफ़ाफ़ा सरकाया गया हो।
मैं उठकर दरवाज़े की तरफ नहीं भागी।
नहीं—
मैं जम गई।
पैर जमीन में धंस गए।
गला सूख गया।
उंगलियाँ सुन्न।
लेकिन दूसरी तरफ से…
किसी ने बहुत धीमी आवाज़ में कहा:
“Anu…”
मेरी आँखें फटी रह गईं।
दिल की धड़कन रुक सी गई।
Aarav की आवाज़।
वही आवाज़।
वही टोन।
वही साँस लेने की लय।
मैंने काँपते हाथ से दरवाज़े की कुंडी पकड़ ली…
धीरे-धीरे…
और जैसे ही मैं कुंडी ऊपर उठाने वाली थी—
अचानक दरवाज़े के नीचे से सरकाया गया नया लिफ़ाफ़ा अपने आप हिलने लगा।
लिफ़ाफ़ा उलटा हुआ, और उसके पीछे एक लाइन लिखी हुई दिखाई दी—
काली स्याही में, बिल्कुल Aarav की लिखावट:
“मत खोलो… वरना मैं तुमसे कभी मिल नहीं पाऊँगा।”
और उसी पल—
बाहर footsteps भागते हुए दूर जाते सुनाई दिए।
किसी के तेज़, भारी कदम।
मैंने दरवाज़ा खोलने की हिम्मत नहीं की।
बस उस लिफ़ाफ़े को घूरती रही, जैसे वो मेरे सीने पर रखी एक बर्फ़ की ईंट हो।
और तभी—
लिफ़ाफ़े के किनारे से कुछ गिरा।
मैंने नीचे देखा।
Aarav का वही पुराना स्टील वाला bracelet…
जो उसके accident वाली रात गायब हो गया था।

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