(“उस रात का सच कभी खत्म नहीं हुआ…”)
ब्रैसलेट मेरे पैरों के पास पड़ा था और जैसे ही मैंने उसे उठाया, उस ठंडी धातु की छुअन ने मेरी उंगलियों को सुन्न कर दिया, जैसे किसी ने अचानक मेरे अतीत का कोई हिस्सा मेरे भीतर धकेल दिया हो; मैं घुटनों के बल बैठी थी और कमरे का अंधेरा मेरी सांसों को चीर रहा था, पूरी हवा में वही हल्की धातु की महक थी जो Aarav की कलाई पर हमेशा रहती थी—वही हथेलियों से रगड़ने पर उठने वाली गर्म स्टील की गंध, वही वजन जो अप्रत्याशित तौर पर हल्का होते हुए भी दिल पर किसी पहाड़ की तरह गिरता था। लेकिन असली झटका तब लगा जब मैंने देखा कि ब्रैसलेट के नीचे सिर्फ़ वो नहीं, बल्कि एक छोटा-सा, मुड़ा हुआ कागज़ का टुकड़ा भी पड़ा था… उसकी कोनों पर हल्का-सा लाल दाग़ था, एक दमदार, ताज़ा खून की तरह नहीं, पर किसी पुराने धब्बे जैसे जो वक्त के साथ हल्का पड़ता है, पर अपनी असल पहचान नहीं छोड़ता। मेरा दिल गले तक आ गया, जब मैंने काँपते हाथों से उस कागज़ को उठाया और उसमें लिखी लाइनें पढ़ीं—“Ye bracelet maine us raat jaha giraaya tha… wo jagah tumhare sochne se zyada kareeb hai.”—ये लाइन इतनी गहरी थी कि जैसे किसी ने मेरे दिमाग के अंदर एक तेज़ हथौड़ा मार दिया हो; उस रात… वो रात जिसे मैं अपनी यादों में जितना दफ़न करना चाहूँ उतना ही वो कहीं किसी परछाईं की तरह बार-बार उभर आती थी; Aarav के दुर्घटना की रात, उसकी टूटी बाइक, सड़क पर बिखरा हुआ काँच, और मैं जो अस्पताल की उस तेज़ गंध में खड़ी चीखती रह गई थी, उस रात का कोई एक हिस्सा भी ब्रैसलेट का नहीं मिला था—तो अगर आज वो मेरे दरवाज़े पर गिरता है, मतलब कोई उस रात की सच्चाई जानता है… या उस रात उसी जगह मौजूद था।
मैं धीरे-धीरे उठकर कमरे के कोने में चली गई, दीवार से टेक लगाई और अपनी धड़कनों को शांत करने की कोशिश की, पर मेरे सीने से उठती बेचैनी उतनी ही ज़ोर से उभर रही थी जितनी हवा बाहर पेड़ों को झकझोर रही थी। मेरी उंगलियाँ कागज़ के किनारे पर लगे खून को छूतीं और हर बार ऐसा लगता जैसे कोई साया मेरे पीछे से झुककर मेरी हर हरकत को देख रहा हो। डर मेरी त्वचा पर चढ़ चुका था, पर डर से भी गहरा एक अहसास था—Aarav का नाम… Aarav की याद… Aarav की handwriting… और ये ब्रैसलेट जो उसकी नसों की तरह मेरे सामने धड़क रहा था।
मैं कहीं रुक ही नहीं पा रही थी कि तभी—दरवाज़े पर हल्की-सी दस्तक हुई। “टुक…” इतना धीमा कि लगा शायद कुछ गिरा है, पर फिर वही आवाज़—“टुक… टुक…” इस बार साफ़, जैसे कोई उंगली से लकड़ी पर हल्का प्रहार कर रहा हो। मेरे शरीर में झटके जैसा करंट दौड़ गया। मैं धीरे-धीरे दरवाज़े की ओर बढ़ी, मेरी परछाईं दीवार पर लंबी होती जा रही थी और मेरा दिमाग हज़ार सवालों से भर चुका था—कौन हो सकता है? क्या वो वही है जिसने खत डाला? या वो जिसने फोटो भेजी थी? या फिर कोई जो Aarav के नाम का इस्तेमाल कर रहा है?
मैंने दरवाज़े के keyhole से बाहर झाँका—लेकिन वहाँ कुछ नहीं था, सिर्फ़ खाली, पीला-सा corridor, जिसकी लाइटें बीच-बीच में टिमटिमा रही थीं, जैसे कोई अदृश्य साया बार-बार इनके आगे-पीछे आ रहा हो। लेकिन मेरी सांस वहीं अटक गई जब मैंने corridor के कोने में एक लंबी, हिलती हुई shadow देखी—धीमी, स्थिर, और किसी इंसान के size की। मैं एक कदम पीछे हटी, और जैसे ही मैंने आँखें दोबारा खोलीं, वो shadow गायब थी। हवा भारी हो गई थी, मेरी साँसें तेज़, और तभी दरवाज़े के नीचे से कुछ फिर सरकाया गया—इस बार कोई लिफ़ाफ़ा नहीं, बल्कि एक पुरानी, चांदी की छोटी-सी चाबी। मैंने उसे उठाने की हिम्मत की, और जैसे ही उठाई, उसके साथ एक मुड़ा हुआ कागज़ का टुकड़ा भी आया। मैंने trembling fingers से उसे खोला और पढ़ा—“Agar sach dekhna chahti ho… to yeh chabi uss jagah ka tala kholti hai jahan se sab shuru hua tha.” मेरा दिमाग ठहर गया—कौन जानता है कि सब कहाँ से शुरू हुआ? कौन जानता है वो टुकड़ा जो Aarav ने मुझसे छिपाया था? और सबसे डरावना सवाल—इस चाबी का ताला कहाँ है?
चाबी पर एक नंबर उकेरा हुआ था—751-A. ये कोई घर नंबर नहीं, कोई लॉकर नहीं। ये कुछ और था—कुछ रहस्य से भरा, कुछ Aarav की आख़िरी मेसेज की तरह। मुझे अचानक याद आया—Accident वाली रात Aarav ने मुझे एक message भेजा था—“Anu, mujhe tumse 7:51 par milna tha…” उस वक्त मैंने सोचा था कि वो समय है, पर क्या वो कोई code था? क्या वो किसी जगह का संकेत था? क्या वो खुद किसी ऐसी जगह पहुँचा था जहाँ वो नहीं जाना चाहता था?
तभी मेरे कमरे की खिड़की के पर्दे अचानक थोड़े हिले—बिना किसी हवा के। और ठीक पर्दे के नीचे चौखट पर एक fresh उंगली का निशान था—लाल, धुँधला नहीं, बिल्कुल उसी रंग का जैसा खत वाले कागज़ के कोने पर था। मैं जम गई। कोई मेरी खिड़की पर उँगली रखकर गया है… अभी-अभी। मैं पीछे हटते हुए दीवार से लग गई और एक भारी साँस मेरे सीने में टूटकर गिरी।
और तभी—
मेरे फोन में अचानक network आया।
एक बार का सिग्नल।
और उसी पल WhatsApp notification।
मेरे दिल की धड़कन इतनी तेज़ हो गई कि मोबाइल उठाते हुए मेरे हाथ काँप रहे थे।
Message from: Aarav ❤️
(जिसका last seen “2 years ago” है)
मेरी रूह सुन्न हो गई।
मैंने message खोला—
एक फोटो थी।
फोटो खुलते ही मेरी टांगें काँप गईं—
ये उसी जगह की फोटो थी जहाँ Aarav का accident हुआ था।
रात का समय।
बारिश।
टूटी बाइक के निशान।
फीका खून का दाग़।
और उस जगह पर—
एक आदमी खड़ा था।
काली hoodie।
चेहरा ढका हुआ।
हाथ में कैमरा।
और उसके दूसरे हाथ में—
वही bracelet।
फोटो के नीचे एक लाइन थी—
“Anu… ab waqt aa gaya hai uss raat ka pura sach dikhane ka.”
मेरे हाथ से मोबाइल गिरते-गिरते बचा।
मैंने चाबी अपनी मुट्ठी में दबा ली।
मेरी नसों में डर और उम्मीद का अजीब सा मिश्रण उठ रहा था।
तभी—
दरवाज़े पर तीसरी दस्तक हुई।
धीमी।
गहरी।
जैसे आवाज़ दिल में धँस रही हो।
“टुक…”
और इस बार बाहर से एक आवाज़ आई—
“Anu…”
वही टोन।
वही सांस की लय।
वही vibration।
Aarav की आवाज़।
“Chabi uthao…
raat 3 bajne waale hain…
aaj darwaaza khulega…”
मेरी सांस रुक गई।
मैंने घड़ी की ओर देखा—
2:57 AM.
तीन मिनट बाद क्या होने वाला था…
मुझे नहीं पता था।
मैंने दरवाज़े की कुंडी पकड़ ली—
धीमे से…
बहुत धीरे…
और जैसे ही घड़ी ने 3:00 बजाए—
दरवाज़े का ताला अपने आप घूम गया।
“क्लिक।”
और दरवाज़ा…
धीरे-धीरे…
अंदर की तरफ खुलने लगा।
मैंने हिम्मत जुटाकर दरवाज़े को धकेला—
और सामने खड़ा वही आदमी था
जिसकी hoodie फोटो में थी।
लेकिन जब उसने अपना चेहरा ऊपर उठाया—
मैंने चीखने की कोशिश भी नहीं की।
क्योंकि…
उसके चेहरे पर Aarav का वही धब्बा था।
वही आँखें।
वही जॉ-लाइन।
बस एक फर्क था—
उसकी गर्दन पर एक ताज़ा खून का निशान था…
और उसके होंठों पर वो मुस्कान…
जो Aarav मरने से ठीक एक घंटे पहले आखिरी बार मुस्कुराया था।
मेरे पैरों के नीचे से जमीन खिसक गई।

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